Saturday, April 21, 2007

कुछ भूली बिसरी बातें |

कितनी ही बार ऐसा होता है के हम अपने काम मे उलझे होते है और अचानक कोई भुलीसी प्यारी धुन सुनायी पड़ती है, घर साफ करते हुए पुराने सामान मे कही पुराने ख़त मिल जाते है, कोई भुलासा गाना कभी राह चलते सुनाई पड़ता है ,कभी खुद कि ही लिखी कविता कही मिल जाती है और भूली यादो का सिलसिला सा जागता है ,कई अनकहे से ख़्वाब लौटते है, कई अश्क जो सुख गए थे फिर पलकें भिगोते है, कई जख्म जो वक़्त के साथ भर गए थे अचानक जागते है \ ये भूली धुन ,भुलासा गाना ,ये पुराने ख़त , ये मासूम अश्क याद दिलाते है एक खुबसुरत अतीत कि ,और होठो पर एक हलकी सी मुसकुराहट खिल जाती है \ कई बंद दरवाजे खुल जाते है, और हम अपनी ही तरफ फिर वापस लौटते है \ कितने ही सालो का फासला पल मे तय हो जाता है और कई लम्हों को फिर से जिंदगी मिल जाती है या शायद उन यादो के साथ हमारी जिंदगी लौटती है \ कितनी ही बाते जो हम ने कहने कि सोची थी ,कई ऐसे पल जिन्हे अपनी जिंदगी मे लाना चाहा था पर हक़ीकत मे ला ना सके ,वो फिर से याद आते है
और हम फिर उन्हें दोहोराते है,बस अपने आप के लिए \ ये यादे शायद हमारी ताकत बनके लौटती है ,चाहे वो हक़ीकत ना बन सकी हो \

ऐसे ही कुछ हालात बन जाते है और मन कह उठता है ----------

आवाजे लौटती है,मुसकुराहटे लौटती है,
अतीत और हमारे बीच कि जंजीरे टूटती है \
गुजरे कई साल ,कुछ पल बन जाते है,
अधूरे से कई ख्वाब फिर नजर आते है\
अनकही कई बातें खामोशी में गूंजती है,
मनचाहे कुछ अपनों को फिर नजरे धुन्धती है \\
कई गुजरे मंज़र फिर से खुद को दोहोराते है,
आज कि तनहाई में हम कल को भी तनहा पाते है \\

......................... शायद हुआ हो कभी ये आप के साथ,कुछ याद है ???

गौरी कमलाकर शेवतेकर

Friday, April 20, 2007

जिंदगी |

परवाना , परवाना नही कहलाता ,
जब तक शमा उसे जलाती नही \
जब तक दर्द का एहसास नही होता,
जिंदगी,जिंदगी कहलाती नही \\

---गौरी कमलाकर शेवतेकर.

Thursday, April 19, 2007

मेरी कविता

जीवन कि परिभाषा क्या है,
है जीने कि अभिलाषा क्या,
कभी ना रुकने वाले समय का,
हर पल है समझाता क्या? १

कौन से सुन रही मैं स्पंदन,
क्या जाग रहा अंतर्मन,
कौन से उत्तर धुंध रही मैं,
कीन प्रश्नों में घिरा है जीवन? २

आज अचानक,
महसूस हुआ जो,
क्या है ये अधूरापन? ३

वक़्त ने भी बदली है करवट,
विचारों कि बदली है गति,
अपने आप कि खोज कर रही,
भीड़ में मैं अकेलीसी ४

कोई ना जानता,कोई ना सुनता,
मेरे मन के स्पंदन को,
मैं ही अकेली देख रही हूँ,
मेरे जग-नवचेतन को !!!! ५

-----गौरी कमलाकर शेवतेकर.








कुछ रिश्ते |

जो रिश्तें दिलों को छू जाते है, उन रिश्तों को हाथों से छूने कि जरूरत नही \ होती बहुत खुबसुरती भर देते है कुछ लोग हमारी जिंदगी में-इतनी कि नजरे भी दुनिया को खुबसुरत महसूस करती है \इतनी कि पहले बदसूरत लगनेवाली दुनिया में हर तरफ खुबसुरती ,अच्छाई और रौशनी नजर आती है \ दिल को सुकून सा महसूस होता है \ क्या नाम होता है इन रिश्तों का,क्या नाम होता है उन लोगो का? होता भी है हर बार ? उनका नाम,वजूद या उस रिश्ते का नाम, ये जान ना जरूरी नही होता \उन रिश्तों को,उन लोगों को महसूस करना जरूरी है \ हर जिंदगी के लिए ऐसा एक रिश्ता,या कहिये ,रिश्ते जरूरी है \
----गौरी कमलाकर शेवतेकर.